“Chalo ik baar phir se” by Sahir Ludhianvi

Come, let us be strangers again, you and I.

I shall no longer hope for any favours from you
Nor shall you look upon me with eyes askance.
And my words shall tremble no more with my heartbeat
Nor the secret of your struggle be betrayed in a glance.

Come, let us be strangers again, you and I.

You too have hesitated to give yourself completely
I too wear disguises, or so I am told
The disgraces of my past are my constant companions
And you too are possessed by the nights of old.

When involvement becomes illness it is best forgotten
When a relationship oppresses it is best to break it
When the adventure you are embarked on cannot be completed
One must find a beautiful way out, and take it.

Come, let us be strangers again, you and I.

Note: translation by Falstaff

चलो इक बार फिर से, अजनबी बन जाएं हम दोनो
चलो इक बार फिर से …

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो गलत अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये मेरी बातों से
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्म-कश का राज़ नज़रों से
चलो इक बार फिर से …

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराए हैं
मेरे हमराह भी रुसवाइयां हैं मेरे माज़ी की – २
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से …

तार्रुफ़ रोग हो जाये तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन – २
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से …